योग के आठ अंगों से युक्त अष्टांग योग में ध्यान (Meditation) एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। यह केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और नैतिक विकास की एक प्रभावी प्रक्रिया भी है। आम धारणा के विपरीत, ध्यान केवल बड़ों के लिए नहीं, बल्कि बच्चों के चतुर्दिक (सर्वांगीण) विकास के लिए भी उतना ही आवश्यक है।
योगाचार्य विजय श्रीवास्तव के अनुसार, आज के समय में बच्चे पढ़ाई, प्रतिस्पर्धा, डिजिटल स्क्रीन और अपेक्षाओं के दबाव में रहते हैं। ऐसे में वे अक्सर चिड़चिड़ापन, अधैर्य, निराशा और भय का अनुभव करते हैं। जब परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं होतीं, तो धैर्य की कमी के कारण वे मानसिक असंतुलन की ओर बढ़ने लगते हैं।

ध्यान क्यों आवश्यक है?
ध्यान बच्चों को कुछ समय शांत चित्त बैठने और स्वयं से जुड़ने का अभ्यास कराता है। यह अभ्यास—
- बच्चों को उनकी प्राकृतिक लय में लौटाता है
- डर, हताशा और असुरक्षा से सामना करने की क्षमता बढ़ाता है
- भावनाओं को समझने और नियंत्रित करने में मदद करता है
- पूरे तंत्रिका तंत्र को संतुलित करता है
मानसिक विकास में ध्यान की भूमिका
ध्यान के माध्यम से बच्चों का पूर्ण मानसिक विकास संभव है। यह उनकी एकाग्रता, स्मरण-शक्ति, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता को सुदृढ़ करता है। बच्चों का मन स्वभाव से चंचल होता है—योगशास्त्र में मन की तुलना मर्कट (बंदर) से की गई है। ध्यान इस चंचल मन पर संयम और लगाम लगाने का प्रभावी साधन है।
व्यवहारिक लाभ
नियमित ध्यान अभ्यास से बच्चों में—
- पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ती है
- क्रोध और तनाव में कमी आती है
- भावनात्मक परिपक्वता विकसित होती है
- सामाजिक व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन दिखता है
निष्कर्ष
ध्यान बच्चों के लिए कोई जटिल प्रक्रिया नहीं, बल्कि सरल, सुरक्षित और प्राकृतिक उपाय है, जिसे खेल-खेल में भी अपनाया जा सकता है। यदि बचपन से ही ध्यान को दिनचर्या में शामिल किया जाए, तो बच्चे न केवल स्वस्थ और संतुलित बनते हैं, बल्कि भविष्य के लिए आत्मविश्वासी, संवेदनशील और सशक्त नागरिक के रूप में विकसित होते हैं।
योगाचार्य विजय श्रीवास्तव — Yoga News 24 के लिए विशेष लेख


